Monday, 14 January 2019

पशुचिकित्सा में औषधीय पौधों का महत्व - Importance of medicinal plants in veterinarian

नमस्कार दोस्तों, apnasandesh.com में आपका स्वागत है। आज के आर्टिकल में हम पढ़ेंगे की पशुचिकित्सा में औषधि पौधों का क्या महत्व होता है, और कौन - कौन से पौधे पशुओं की औषधि में महत्वपूर्ण है।

पशुचिकित्सा में औषधीय पौधों का महत्व - Importance of medicinal plants in veterinarian

भारतीय कृषि में पशुधन किसान के जीवन का अहम हिस्सा है, यह किसान को दूध, मांस, गोबर, ईंधन आदि प्रदान करते है। पशुधन ग्रामीण की आयु एवं रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है, इस तरह से ये ग्रामीण लोग अपनी अर्थव्यवस्था को बनाये रखते है। पशुचिकित्सा संबधी स्वदेशी ज्ञान मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक तजुर्बेदार किसानो द्वारा आगे बढ़ाया जाता है। लिखित में इसका उल्लेख कम ही पाया जाता है। जिसकी वजह से यह धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है। हमारे स्वदेशी औषधीय पौधों के ज्ञान की बहुत महत्वता है। इनके उपयोग से हम अपने ग्रामीण जीवन में तेजी से सामजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास कर सकते है।

ग्रामीण किसानो द्वारा औषधीय पौधों के विभिन्न भाग पशुचिकित्सा के प्रयोग में लाये जाते है। ज्यादातर पौधों की पत्तिया सबसे ज्यादा औषधीय गुण वाली होती है। क्रमशः बीज, छाल, फल, फूल आदि अलग-अलग बीमारियों में अलग-अलग तरीके से यह पौधे प्रयोग में लाये जाते है। औषधि बनाने के कुल मिलाके 9 तरीके है, मभूत, काढ़ा, निचोड़, रस, लेई, चुरा, घोल, तेल एवं उबला हुआ महत्वपूर्ण औषधीय पौधा। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में अत्याधिक उपयोग में लाए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण औषधीय पौधे निम्मलिखित है।


पशुचिकित्सा में औषधीय पौधों का महत्व - Importance of medicinal plants in veterinarian

बबूल - Acacia :-

इसकी पत्तिया, फूल और छाल में अत्याधिक औषधीय गुण पाये जाते है।
इसके फूल पीलिया निवारण में काफी उपयोगी है।
200 ग्राम बबूल को पीसकर 250 मि.ली. पानी के साथ मिलकर सुबह शाम 15 दिन तक पिलाना चाहिए।
इसकी छाल निचोड़ कर 15 - 20 दिन तक सुबह पेचिश होने पर पशु को पिलाना चाहिए।

हींग - Asafoetida :-

बराबर की मात्रा में हींग के पत्तियो का रस और जामुन की छाल के रस को मिलाकर एक सप्ताह तक दिन में तीन बार पिलाने से दस्त और पेचिस में राहत मिलता है।

प्याज - Onion :-

प्याज को अच्छी तरह पीसकर 100 मि.ली. सरसो के तेल और 25 ग्रा. केले के पते के मभूत के साथ मिलाकर पशुओ की त्वचा पर लगाने से बाह्य परजीवियों से छुटकारा मिलता है।
प्याज के कद के पेस्ट को सरसो के तेल के साथ मिलाकर दिन में तीन बार एक महीने तक देने से लाभ होता है।
पशुचिकित्सा में औषधीय पौधों का महत्व - Importance of medicinal plants in veterinarian

शतावरी :

शतावरी में एन्टीसेट्टीक, आक्षेपनाशक तत्व पाए जाते है। यह आयुर्वेद, यूनानी सौर सिध्द में पारंपारिक दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 
मवेशियों में गठिया के उपचार के लिए 500 ग्रा. सतावरी के पाउडर के दूध को एक महीने तक मवेशियों को देना चाहिए।

सत्यानाशी ( कटैल ) - Satnasi :-

सत्यानाशी के पत्तियों का 100 ग्रा. रस निकालकर पशुओं के संक्रमित खुर में लगाने से संक्रमण दूर होता है। इस रस को गठिया से प्रभावित शरीर के भाग पर लगाने से यह ठीक हो जाता है।

नीम - Azadirachta indica :

निम अपने रोगानराधी, कैंसर विराधी, एंटीऑक्सीडेंट एवं घाव भरने की गुणवत्ता की वजह से जाना जाता है।
निम के पेड़ का लगभग हर हिस्सा उपयोगी है। 
नीम की छाल 500 ग्रा. एवं बबूल की छाल 260 ग्रा. को एक साथ पानी के साथ पीसकर घाव में लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है।


बास - Bass :-

बास की पत्तिया को 100 - 200 ग्रा. के मात्रा में गर्भवती भैसो को प्रसव के एक महीने पहले प्रत्येक दिन दो बार खिलाने से प्रसव आसानी से होता है।
इसके आलावा कंद और बास की ताजी पत्तिया का पेस्ट बनाके दस्त पीड़ित पशु को दिन में दो बार, एक सप्ताह तक देने से राहत मिलती है।

पलाश - टेशू - Palaash :-

पलाश को जंगल की आग भी कहते है। इसके फूलो का काढ़ा मवेशियों में पक्षाघात एवं पेशाब में जलन जैसी समस्याओ में लाभकारी है।
इसे काढ़े के रूप में कम से कम एक महीने तक दिन में तीन बार पशु को देना चाहिए। 

टाक - Taco :-

टाक के फूल 50 ग्रा. एवं गुड़ 100 ग्रा. दोनों का मिश्रण बनाकर गर्भवती पशु को खिलाने से प्रसव में आसानी होती है।
टाक का दूधिया लैटेक्स सर्प द्वारा काटे गए स्थान पर लगाने से जहर को निष्प्रभाव करता है।

अमलतास - अश्वगंधा - Ashwagandha :-

आयुर्वेद में इस वृक्ष को रोगमारक भी कहते है। यह वृक्ष त्वचा रोग एवं ह्रदय की समश्याओ के इलाज में कारगर है।
अपाचन में अमलतास की फली का पेस्ट गेहू की रोटी के साथ दिन में दो बार देने से लाभ मिलता है।
यदि आपके मवेशी को भूख न लगने की समश्या है तो इसकी पत्तियो का पेस्ट सरसो के तेल के साथ मिलाकर 5 दिन तक दिन में दो बार दे।
इसकी पत्तियों को उबाल कर रेचक के रूप में दिया जाता है।

धनिया - coriander :- 

धनिया की पत्तिया एक टॉनिक एवं उत्तेजक के रूप में काम करती है। 
धनिया के बीज की पावडर को मेहंदी के पत्तो के साथ पीसकर पेस्ट बनाये और दस्त पीड़ित पशुओं को दिन में दो बार दे। 

दुब - घास - Grass :-

दुब घास के ऊपरी हिस्से को खाद्य के रूप में 80.3 कि.ग्रा. दिन में मवेशियों को देने से दूध की गुणवत्ता बढती है। 
यदि आपके मवेशी की आंख आई हो तो दुब घास की पट्टी का एक चम्मच रस आँखों में तीन दिन तक रोज सुबह डालने से ठीक हो जाता है। 

पीपल - Ficus religiosa :-

पीपल की पत्तिया का रस टांसिल के इलाज के लिए किया जाता है। 

पुदीना की पत्ति 260 ग्रा. एवं ब्राष्मी की पत्ती 200 ग्रा. की पेस्ट बनाकर बुखार से पीड़ित पशु को दिन में दो बार सात दिन तक देने से राहत मिलती है। 

ताजी तुलसी की पत्तिया 360 ग्रा. को 200 - 300 मि.ली. पानी में उबाल कर काढ़ा बनाये और सर्दी-खासी होने पर पशु को दे।

चावल - Rice :-

चावल को काले चने, काली मिर्च और काळा नमक को एक साथ पानी में पकाये और फिर इस मिश्रण को आप मवेशी को दिन में दो बार, एक महीने तक खिलाते रहें इससे मवेशियों की लम्बे समय तक दूध देने की क्षमता बढाती है। 



आरंडी :-

यदि पशु की कब्ज की समस्या है तो आरंडी के 50 ग्रा. बीज खाद्य के साथ मिलाकर मवेशी को सात दिन तक खिलाइये। 

अमरुद - guava :-

अमरुद की तजि पत्तियो को एक लीटर पानी के साथ उबाल कर काढ़ा बनाइये और बुखार- पीड़ित जनावर को दीजिये। 

इमली - tamarind:-

इमली की तजि पत्तिया ( 400 - 600 ग्रा. ) को पानी में उबाल ले और मवेशियों के शरीर के सूजे हुए भाग में बाँध दे, इससे सूजन कम होने लगती है। 
इमली के पके हुए फल एवं लहसुन का पेस्ट बाना ले, फिर इस मिश्रण को सरसो  में हल्का ताल के पशु के जीभ पर हुए घाव में लगाए।

बेर :-

बेर की पत्तियों के पेस्ट का अलसी के तेल में मिलाकर त्वचा के जले हुए भाग में लगाने से आराम मिलता है।  इस इलाज को दिन में तीन से चार बार एक सप्ताह करना जरुरी है।
पशुचिकित्सा में औषधीय पौधों का महत्व - Importance of medicinal plants in veterinarian
हमारे देश में अधिकतर किसान भाई पशु रखते है, लेकिन उनमे अभी भी पारम्पारिक इस्तेमाल होने वाले औषधीय पौधों के बारे में शायद ही जानते होंगे। किसान भाई अगर ध्यान दे तो उनके ग्रामीण भाग में ही बहुत ऐसे औषधीय पौधे मौजूद है। जिसका यदि समझदारी से उपयोग किया जाये तो पशुओं के उपचार में होने वाले व्यय से बचा जा सकता है। साथ में पशु भी स्वस्थ रहेंगे लेकिन यह उपचार करने से पहले आप को औषधीय गुणों की जानकारी होना जरुरी है। यदि आपको जानकारी नहीं है तो आप अच्छे पशु वैधीकीय चिकित्सक से जानकारी पाकर पशु को स्वस्थ रख सकते है।

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                                                                                                                      Author By :टेकचंद सर ...
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