Saturday, 5 January 2019

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवन कहानी - Life story of Rani Lakshmi Bai of Jhansi

नमस्कार दोस्तों, apnasandesh.com में आप सभी का स्वागत है। मेरा नाम भारती है, इस वेब साइट पर यह मेरा पहला Post है। आज मै इस आर्टिकल में झासी की राणी लक्ष्मी बाई, इनके बारे में जानकारी देने जा रही हु। उम्मीद करती हु की यह आर्टिकल आपको पसंद आए।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवन कहानी - Life story of Rani Lakshmi Bai of Jhansi

भारत राज्य में थोर महापुरुषों की गाथा गाई जाती है, वैसे ही हमारा भारत एक थोर महापुरषो की भूमि है। जो हमारे मनोबल को बढ़ाता है। आज भी हम उनके पराक्रमो की गाथा गाते है। वैसे हमारे भारत संस्कृति में रानी लक्ष्मी बाई इनकी जीवन गाथा अमर हुई है। तो दोस्तों आज हम उनके परक्रमो और जीवन गाथा जानने वाले है, तो चलिए देर न करते हुए उनके जीवनी के बारे में जानते है।


झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवन कहानी - Life story of Rani Lakshmi Bai of Jhansi :

राणी लक्ष्मी बाई भारतीय स्वातंत्र्य युद्ध के शुर विरो में से एक है। एक स्त्री होकर भी अंग्रेजो से टक्कर लिए। युद्ध में उनके कौशल्य आश्चर्य करने वाले थे। आज भी भारतीय लोक कथाओ में उनका नाम बहोत ही आदर से लिया जाता है। इनका जन्म एक साधारण ब्राम्हण परिवार में हुआ था। इनका सिर्फ बालपन ही नहीं तो पूरा जीवन ही संकटों से भरा हुआ था।

सन 1857 के स्वातत्र्य युद्ध में उनका योगदान बहुत ही बड़ा था। उनके उम्र के साल वाली कुछ साधारण स्त्रि अपने वैवाहिक जीवन का सुख देखते है। लेकिन झासी की राणी ने अंग्रेजो को भारत के बाहर निकालने का सपना देखे।

उनका एक ही संकल्प था की मै अपनी झासी नहीं दूंगी। जिस काल में स्त्रियों को दुबले और अबला समजते थे, तब से ही उनकी गर्जना सुनकर शुर पुरुषो के शरीर में संसार करनेवाली बाते थी। वे बहोत ही शौर्य से इंग्रजो से लढे, उन्होंने बता दिया की भारतीय स्त्री धर्य और वीरता में पुरुषो से कम नहीं है। स्त्रीया भी देश का नेतृत्व कर शकते है। देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी कर सकते है। स्त्रीया राष्ट्र संस्कृति के आयने है। स्त्रीयो के थोर व्याक्ति महत्त्व से राष्ट्र का परिचय मिल जाता है। ऐसे भारतीय संस्कृति में बहोत देखने मिलेंगे।

राणी लक्ष्मीबाई का जन्म - Birth of Queen Laxmibai :

वाराणशी में मोरोपंत ताम्बे नाम का ब्राम्हण परिवार रहता था ! उनकी पत्नी का नाम भागिरथी बाई था। वो सुंदर और सुशिल स्वाभाव के थे। 16 नवम्बर 1835 को उन्होंने एक लड़की को जन्म दिया। लड़की का सौदर्य देखकर माता-पिता ने उनका नाम ‘मणिकर्णिका ‘रखे। उनको लाड – प्यार से मणु कहते थे। माता-पिता मनु का लालन-पालन करने लगे।


मनुबाई ने अपनी माँ को खो दिया - Manubai lost his mother :

जब मनुबाई चार वर्ष के थे तब उन्हें बहोत ही बड़ा दु;ख हुआ, की उनकी माता का देहांत हो गया। इस दुःख के वातावरण में मनु के पिताजी याने मोरोपंत जी को अब मनु के लालन - पालन का विचार आया। मोरोपंजी अपने पत्नी से बहोत ही अधिक प्यार करते थे। उनके मन में अक्सर खयाल आता था की ''मै अब कैसे जीवन बिताऊ'' लेकिन ''मणिकर्णिका'' के लिए उनको इस बड़े सदमे को सभालना था। 

मणिकर्णिका एक असामान्य लड़की है - Manikarnika is an unusual girl :

मोरोपंत जी को अपने लड़की में प्रभावी व्यक्ति के कौश्यल्य दिखाई देते थे। इसीलिए उन्हें लगता था की उनके लड़की का पालन कुछ अलग अंदाज से होना चाहिए। तभी एक दिन मोरोपंत जी को मनु घुड़सवारी करते हुए नजर आई और यह देखकर मोरोपंत जी आश्चर्यचकित हुए। तभी उनके मन में विचार आया की अब मनु को घुड़सवारी और तिरबाजी जैसे कलाओं का प्रशिक्षण देना चाहिए।

मनु को प्रशिक्षण करते समय कलाओ का प्रदर्शन देखते हुए उनके गुरु आश्चर्यजनक हुए, तभी उन्होंने मनु के पिताजी को मनु के पराक्रमो के बारे में बताया। यह सुनकर मोरोपंत खुस हुए, साथ ही उनको जाणीव हुआ की वह एक लड़की है तभी उन्होंने मणिकर्णिका को बंधनो में डालने का विचार किया।

मोरोपंत कन्या का विवाह - Maropant girl's marriage :

एक दिन मोरोपंत झासी के राज पुरोहित बाजीराव पेशवे इनको मिलने के लिये गये, वे पंडित तात्या दीक्षित थे। वे प्रशिद्ध ज्योतीशी थे, तात्या दीक्षित को देखकर मोरपंत जी बोले महाराज मेरी लड़की बहोत सुंदर और बुदधीमान है। उनकी माँ का (भागीरथी ) देहांत हो गया इसलिए मनु के विवाह के लिए मैं ज्यादा वक्त गुजार नहीं सकता। उसके लिए आपने एक अच्छासा स्थल देखे ऐसा मुझे लगता है। पंडितजी बोले, जी एक दिन राजा खुद ही आपके घर लड़की का हात माँगने आएगे। यह सुनकर मोरोपंत जी का खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

झाशी के महाराज गंगाधरराव - Jhansi's Maharaja Gangadhararao :

झाशी के महाराज गंगाधरराव एक बहोत ही अच्छे राजकर्ते थे। उनके राज्य की प्रजा बहोत प्रसन्न थी। एक दिन उन्होंने स्व:मत से कहा। हे भगवान अब मैं वृद्ध हो चूका हु, लेकिन मुझे अभी तक संतान नही हुए, यह सोचते रहते थे। महाराज की इसके पहले शादी हुई थी लेकिन उनको पुत्र प्राप्ति नही हुई थी। एक दिन महाराज ऐसेही राजगद्दी पर बैठे विचार कर रहे थे, तभी उनके राज पंडित तात्या वहा पदारे। वह पूछने लगे महाराज क्या हुआ तभी महाराज कहते है की, तात्याजी आपको तो पता हि है, की मेरी उमर हो गई है और इस राजगद्दी को सभालने के लिए मेरा कोई वारिस नहीं है। तभी तात्या पंडित जी मणिकर्णिका के बारे में बताते है। और फिर मणिकर्णिका का विवाह झाशी के महाराज गंगाधरराव जी से होता है।

अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह - Rebellion against the British :

1857 का विद्रोह पूरे हिंदुस्तान में हुआ। तदनुसार, 5 जून, 1857 को झाँसी में सैनिकों का प्रकोप हुआ। केवल 35 सैनिकों ने अंग्रेजों का अपहरण किया। इस स्थिति में, ब्रिटिश अनुमति के बिना रानी रानी लक्ष्मीबाई किले में चली गईं। अगला 22 जुलाई, ई. सन. 1857 में, अंग्रेजों ने रानी को झांसी का अधिकार संभालने के लिए कहा। रानी को फिर से शासन दिया गया था, लेकिन बहुत कठिन परिस्थितियों में, वह सरकार द्वारा शासित थी। कोई जनशक्ति नहीं थी और खजाना खाली था।
झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवन कहानी - Life story of Rani Lakshmi Bai of Jhansi

जनता के मन में जो असुरक्षा थी, वह भविष्य से डरती थी। लेकिन फिर भी लक्ष्मीबाई ने स्थिति से दृढ़तापूर्वक सामना किया। पुराने विश्वास के लोगों को वापस बुलाना और उन्हें अधिकार की कुछ शक्तियां देना। दीवान लक्ष्मणराव को प्रधान मंत्री, और प्रत्यक्ष पिता - मरोपंत तंबे - कोषाध्यक्ष। लक्ष्मणराव के भाई, पुत्र, मुंसफ, भोलानाथ, और नामांकित गेंदबाज, खुदाशक्षक ने सेना और हथियारों का मुकाबला करने का काम दिया। बिंदखोर ठाकुरों ने राजनीतिक रूप से अपना पक्ष रखा। राज्य के सलाहकार बोर्ड को इसमें शामिल किया गया है। अंग्रेजों ने 22 तोपों के बारूद को फिर से शुरू किया और गोलियों का उत्पादन शुरू किया।

विद्रोही सैनिकों में शामिल हो गए जिन्होंने अपनी सेना में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। अजनबियों के खिलाफ लड़ने की तैयारी करते हुए, रानी ने अपने गौरव, वफादारी और खुशी को बनाए रखने की कोशिश की। दानशूर, धर्मपरायण और दयालु लक्ष्मीबाई ने हजारों तेरह हजार गरीबों, साधुओं और सन्यासियों को गर्म कपड़े वितरित किए। रानी के द्वारा स्वयं पर विश्वास करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। रंगों का त्योहार मनाने के बाद, उन्होंने महिलाओं के लिए 'हल्दी-कुंकवार' जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए।

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