Monday, 11 February 2019

सबसे अच्छी संपत्ति कैसे प्राप्त करें - How to get the best asset

नमस्कार दोस्तों, www.apnasandesh.com में आप सभी का स्वागत है। आज के आर्टिकल में हम पढ़ेंगे की सबसे अच्छी संपत्ति कैसे प्राप्त करें, इस लेख से किसीका जिवन परिवर्तन हो सकता है। इसिलिए मैंने यह लेख पब्लिश किया है, या कुछ अच्छा पढने को मिले।

सबसे अच्छी संपत्ति कैसे प्राप्त करें - How to get the best asset

सबसे अच्छी संपत्ति कैसे प्राप्त करें - How to get the best asset :

श्रेष्ठ कर्मो की पुंजी-
इस संसार में जिसने भी कर्मेद्रियां का आधार लिया है उसे कर्म करना ही पडता है। इस संसार में जो भी सूःख-दुःख है वह अपने ही अच्छे कर्मो से सुख बुरे कर्मा से दुख, इसलिए जिवन को कर्मप्रधान कहा जाता है। इसी सिद्धांत के आधार पर मनूष्य को अपने जिवन में सत्यता के आधार पर अपने जिवन में श्रेष्ठ  कर्म करके आध्यात्मिक मुल्यों  को बढाना अति आवष्यक है।

श्रेष्ठ कर्म कि परिभाषा-
ईश्वर जो हमें श्रेष्ठ मत देते है उसे श्रीमत कहते है। उसे अपने जिवन में अपनाने से मंसा, वाचा, कर्मणा श्रेष्ठ कर्म स्वतः होते है। जिससे जिवन में सत्यता, दिव्यता आती है और धर्म श्रेष्ठ, कर्म श्रेष्ठ बनते है।


शुभ भावना श्रेष्ठ कर्मा की सफलता की कुंजी है। सबके लिए शुभभावना रखना अत्याधिक आवष्यक है, शुभ भावना से सबके मन में आत्मिक प्रेम, आत्मिक स्नेह जागृत होता है। आत्मिक प्रेम अपनी पवित्र चुंबकिय शक्तिया से जगत के जन-जन को प्रभावित करके आपस में सभी को निकट लाती है। सदा यही मन में यही आशा होती है कि सेवा करूं तो श्रेष्ठ कर्म जमा होंगे। इस बात पर ध्यान दे की हमारे अंदर की बुराई शुभ भावना रूपी कुंजी छीन न ले। हमारे लिए कोई गलत या बुरा दृष्टिकोन रखता है। फिर भी हम उसके प्रति अपनी शुभभावना न बदले क्योंकी मनुष्यों के विचारों की तरंगे एक तरह की सजीव तरंगे वह सुक्ष्म तरंगे है जो दुसरों पर बहूत गहरा प्रभाव डालते है। शुभ सोचने से हम दुसरों को व खुद को सुख देते है, अशुभ सोचने पर खुद को व दुसरों को दुख देते है।

श्रेष्ठ संकल्प ही श्रेष्ठ कर्म के लिए आवश्यक है :

श्रेष्ठ कर्म करना है तो हमारे विचारों का संकल्पों कर प्रवाह सदा श्रेष्ठ तथा महान हो। जैसे उसके विचार की तंरगे संकल्पो की तंरगे होती है वैसे ही उसका जीवन होता है अर्थात उसके जिवन का प्रतिबिंब। जैसे एक बिज में एक पेड उत्पन्न करने की क्षमता होती है वैसे ही श्रेष्ठ संकल्पो के बीज में एक असीम शक्ति होती है जो श्रेष्ठ कर्मो की रचना होती है। इसिलिए सदा मन में शुभ व पवित्र संकल्पो की रचना करने की आदत रहें। जब मन में कोई कार्य करने के लिए उमंग तथा स्पूर्ति भरा संकल्प चलता है तो उसे तुरंत प्रयोग में लाए, तुंरत काम करने में अपनी योग्यतायें, शक्तिया जमा रहती है यही आदत हो तो मनुष्य जरूर अच्छे कर्म प्राप्त कर सकता है।

श्रेष्ठ कर्म के लिए वाचा भी श्रेष्ठ :

बोलचाल व्यवहार से मनुष्य के व्यक्तित्व की परख होती है। इसके लिए कम बोलना प्रभावशाली होता है, यही बोल अपने व्यक्तित्व का प्रभाव बढाती है। देखाजाय तो व्यर्थ बोल बोलने से हमारे मानसिक तथा शारीरिक शक्ति का पतन होता है। मन और बोल का आपस में बहुत गहरा प्रभाव पडता है। इसीलिए सजीव प्राणी व्यर्थ बोलने लगता है, इसके कारण मन दुःखी व कमजोर होता है। जिसका परिणाम अलौकिक उन्नती के स्तर को निचे लाता है।


श्रेष्ठ भावना श्रेष्ठ कर्म के लिए आवष्यक :

हमेशा सभी मनुष्य के लिए उंची व श्रेष्ठ भावना रख कर्म करते रहिये। हमे कोई सफलता की सिढी से निचे खिंचने की कोशिस करता है फिर भी हम उसका भला ही करें,यह सदा याद रखना है। हमारे लिए जो कांटा बोता है उसके लिए भी हमें शुभ भावना रखना है। क्योंकी हम दुःखहर्ता, सुःखकर्ता शिवपिता की संतान है। हमें दुसरों का दुःख हरना है।

जब हम दुसरे के लिए बुरा सोचते है तो सबसे पहले उसका असर हमारे मन पर होता है। ऐसा कर्म करते हम दुःख की लहर अनुभव करते है। संसार मे अपने दयालुता का प्रयोग करना दुःखी व्यक्ती को सुअवसर मिलना कृतार्थ पाने वाला होता है, ऐसे व्यक्ती के हम कृतज्ञ है।

ऐसे श्रेष्ठ करने से हमे आंतरिक ख़ुशी मिलती है। दुसरों के मन से हमें दुवायें मिलती है। परमात्मा जब इस धरती पर आते है तब हमे दुवायें जमा करने का युग होता है, श्रेष्ठ कर्म करने से हम श्रेष्ठ आत्मा बन जाते है। सभी का भला करने से हमारा भला होता है।

विकट परिस्थ्ति में श्रेष्ठ कर्म की पुंजी साथ आती है। कहावत है कि हम खाली हाथ जायेंगे, पर यह सत्य नही है। हमारे साथ हमारे श्रेष्ठ कर्म जाते है, उन्ही कर्मो से नई तकदीर बनती है, नया जन्म मिलता है। यह अविनाशी सत्य है कि कर्म सदा हमारा पिछा करता है।


कर्म श्रेष्ठ हो या कम दर्जे के हो वह परछाई की तरह हमेशा साथ रहते है। जीवन में कर्म की प्रधानता पर गुढ विश्वास रख श्रेष्ठ कर्मो की पुंजी बढाते रहने से जीवन में कल्याण है। यह पुंजी ही अविनाशी चलनेवाली संपदा है, जो अंत तक हमारे साथ रहती है। उदा. के तौर पर हम अचानक संकट में फंस गये, दुर दुर तक कोई सहायता करने वाला नही होता हमारे पुण्य कर्म ही हमारी सहायता करते है।

श्रेष्ठ कर्म की पुंजी भगवान से माफी दिलायेगी :

कहते है कि हमारे कर्मो का लेखा जोखा भगवान के पास होता है। जिन मनुष्यों के खाते में श्रेष्ठ कर्मा की पुंजी अथाह होती है। भगवान उन्हे छोटी मोटी गलती की माफी करता है। जिनके पास पाप कर्मो की पुंजी होती है, उन्हे भग्वान के घर से सजायें खाकर आना पडता है। तब उन्हें अपने किये हुये पाप कर्मा का अत्यंत दुःख होता है, पछाताप के आंसु रोते है। पछाताप की अग्नि वह खुन के आंसु रोते रहते है। हे मनुष्यों सावधान होकर अपना अमुल्य समय शक्तिरूपी खजाना जमा करने में जुटे रहो।

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श्रेष्ठ भाग्य बनता है श्रेष्ठ कर्म करने से :

जहा श्रेष्ठ विचार नही, संकल्प नही, वहां श्रेष्ठ संस्कार नही, अर्थात उस परिवार में दुःख और अशांति का माहौल बना रहता है। जहा विचार श्रेष्ठ वहां संस्कार का मिलन होता है, जो महात्मायें दिल से दुसरों की सेवा करता है। पुण्य कर्म जमा करने से महादानी आत्माओं की महीमा होती है। अभी हमारे किये पुण्य किसी ना किसी रूप में हमें सहयोग अवश्य पदान करती है। परिवर्तन की शक्ति से सर्वश्रेष्ठ कर्म करने का संकल्प ले जिससे सर्वात्तम धन श्रेष्ठ कर्म को वृद्धी को पायेगा।

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धन्यवाद।
                                                                                                                         Author By : BK गीता...
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