Saturday, 23 March 2019

जैसी करनी वैसी भरनी - As you sow, so you shall reap

नमस्कार दोस्तों, apnasandesh.com में आप सभी का तह दिल से स्वागत है। दोस्तो आज के इस कहानी में हम जानेंगे की हमारे जीवन में जिस तरह हम अपने आप को बनाते है, वैसा ही फल हमे प्राप्ति होता है।

जैसी करनी वैसी भरनी - As you sow, so you shall reap

कुछ पाना है तो मेहनत जरुरी है। हर एक व्यक्ति अपने जीवन में खुशिया पाने के लिए सही या गलत तरीका आजमाने का प्रयास करता है। लेकिन जो व्यक्ति सही में सच के साथ होता है उसका भला ही होगा और जो व्यक्ति बुरे के साथ होता है उसका बुरा ही होता है। हम कई ज़माने से सुनते आ रहे है की हमारे व्यवहार से ही हमारी जित है। भले ही हम अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करे तो भी कुछ वक्त के लिए हम दोषी साबित होते है। लेकिन कभी भी हमें गलत व्यक्ति या गलत संगत का विचार भी अपने मन में नहीं लाना चाहिए। क्योकि अगर आप सही हो और आपको अपने पे भरोसा है तो एक न एक दिन सफलता मिलनी ही है। इसलिए कहने वाले कहते भी जैसा आप सोचोगे वैसा पाओगे, जैसी करनी वैसी भरनी, जैसा बीज वैसा फल। इसपर दोस्तों मुझे एक सुन्दर सी कहानी याद आ रही है, जो आपके साथ साझा कर रही हु।



जैसी करनी वैसी भरनी - As you sow, so you shall reap :-

इलाहबाद के पास एक छोटे से गांव में आदिनाथ नामक एक व्यक्ति रहता था। वह एक किसान था, किसान बहुत ही समझदार और मेहनती था। उसको दो लडके थे, एक का नाम त्रंबक था और दुसरे का नाम बंसीलाल था। बंसीलाल एक भोला और कम समझदार था। त्रंबक चतुर और समझदार था। आदिनाथ अपने बच्चों को हर समय एक सिख देता था की जैसा बिज बोओगे वैसा हि फल मिलेगा। इस बात की गहराई को बसींलाल नही समझता था। आदिनाथ बुढा हो रहा था। और बीमार भी रहने लगा था। उसने सोचा मेरे रहते संपत्ति दोनो बेटों में बराबर बांट दुं। ताकि दोनों भाई आपस में लडे नही। आदिनाथ ने एक दिन दोनो बेटो को बुलाकर सारी संपत्ति का बंटवारा दोनो बेटो में बांट दी। उसके कुछ दिन पश्चात ही आदिनाथ ने अपने प्राण त्याग दिए।

जैसा बिज वैसा फल - Jaisa Bij Vaisa Fal :-

बंसिलाल ने अपने पिता की सिख की गहराई को समझा नही । त्रंबक ने उस बात की गहराई को जाना था। त्रंबक ने सुझबुझ और समझदारी से काम लेते हुए बाजार से अच्छा बिज खरीदकर लाया। उसने खेत ज्योतकर खेतों में बीज बो दिये। लेकिन बंसिलाल को अपने पिता की सिख याद रही और उसने खेत ज्योतकर जमिन में पैसो को बो दिया। वह इंतजार करता रहा कि खेत में अभी फसल आयेगी। बहोत दिन होने पर फसल आई नही। बंसिलाल का खेत जैसा का वैसा था। बहोत दिन हो गये बंसिलाल चिंता में डुब गया। त्रंबक के खेत में फसल लहराने लगी थी। अपनी फसल देख वह बहूत खुश था।


बंसिलाल के खेत में एक भि पेड नही आया तो वह चिंता में रहने लगा और बिमार रहने लगा। त्रबंक को अपने भाई की ऐसी हालत देख बुरा लगा और वह अपने भाई के पास गया और पुछने लगा कि क्या हुआ ? ऐसे बिमार क्यों हो और क्या चिंता है ? खेत क्यों नही बोएं ? बंसिलाल ने सारी बाते अपने भाई त्रंबक को बताई। पहले तो त्रंबक अपनी भाई की नासमझी पर बहुत हसा और उसको अपने भाई की दया भी आई। उसने अपनी छोटे भाई को पिता की दि हुई सिख का अर्थ समझाया। दुसरों के साथ जैसा व्यवहार करोगे वैसा हमको फल मिलता है। हर बार गलती हम करते है और हम भगवान को दोष देते है। हे भगवान तुने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ? पर कर्म हम करते है और हमारे कर्म की सजा हमें ही भुगतनी पडती है। पर हम खुद की गलती को नही देखते है। हम हमारे गलती के लिए हम दुसरों को दोष देते है या भगवान को दोषी मानते है। इसिलिए कहावत भी है कि ''पेड बोए बबुल के तो, आम कहां से पाएं’'।

बंसिलाल अपनी भाई की बातों का मतलब समझ गया। फिर दोनो भाई खेत में गए और जमिन से बोया हुआ रूपया निकाल लिया। फिर से खेत में हल चलाकर पिता की दीये रूपयों से बंसिलाल ने बिज खरिदकर लाया। और जमिन में बो दिया। कुछ दिनों पश्चात खेत से अंकूर आए और अच्छि फसल आई। तब बंसिलाल को समझ में आया कि खेत में सिर्फ बीज ही बोयें जाते है।

कहानी का सारांश :-

भावार्थ आजकल के मनुष्य जल्दि अमिर बनने के लालच में कुछ भि करने को सोचते नही। दुसरों का बुरा करके खुद अमिर बनना चाहते है। दुसरों को आगे बढता हुआ नही देख सकते। उसका नतीजा उन्हें सफलता नही मिलती और दुःखी होते है, इसिलिए कहते है जैसा बिज वैसा फल याने की जैसी करनी वैसे भरनी।

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जैसा बिज वैसा फल - Jaisa Bij Vaisa Fal, जैसी करनी वैसी भरनी - As you sow, so you shall reap, दुसरो का बुरा सोचोगे तो आपका भी बुरा होगा, बुरा सोचो बुरा ही मिलेगा - अच्छा सोचो अच्छा ही मिलेगा। 



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                                                                                                                           Author By : BK गीता...
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