Wednesday, 24 April 2019

सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है - Is the best asset

सभी को नमस्कार, apnasandesh.com पर आपका स्वागत है। सूत्रधार को सहायता मिलती है, इसके मूल सिद्धांतों को समझने में, आज के लेख में जिनेंगे की जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करने से अधिक सफलता मिलती है।

सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है - Is the best asset

सुःख देने वाला सुःख ही पाता है - Sukh dene vaala sukh hi pata hai :-

एक बार बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक होटल के मालिक के टेबल पर कुछ सिक्के रखे और बोले आपने मुझे कठिण परिस्थिती में बहोत मदद की, इस लिए आपका तह दिल से सुक्रिया। उस समय मैं दुःखी और मुसिबत में था। मुझे मेरे किसी रिस्तेदार की मदद नही मिली। मैं निराश हो गया था। लेकिन आपकी मदद से मैं आज इतना समर्थ हो गया हूं की आपके एहसान का बदला नही चुका सकता पर आपके सिक्के वापस करता हुं। कुपया आप इन्हें स्विकार करें। मै यह सिक्के आपको वापस करने आया हूं।

बेंजामिन फ्रैंकलिन कि बात सूनकर होटल का मालिक घूरते हुये बोला माफ करिये भाई साहब मैं आपको नही जानता, और ना ही मुझे याद है कि मैंने किसी को उधार दिया था। बेंजामिन होटल के मालिक को याद दिलाते हुए बताया कि मैं उस समय एक प्रेस में अखबार छापने का काम करता था। मेरी अचानक एक दिन तबियत खराब हो गई थी। तब आपने मुझे 20 डॉलर लिये थे। यह सूनकर मालिक ने अपने दिमाग पर जोर दिया और याद करने कि कोशिस की तो उसे याद आया कि मैंने किसी की एक बार मदद की थी। होटल के मालिक ने गर्दन हिलाते हुये कहा कि हां मुझे याद आया। एक बालक प्रेस में काम करता था और उसकी तबीयत खराब होने पर मैंने उसकी मदद की थी। यह मदद मैंने एक इंसानियत के नाते से किया था। उस समय उसकी आपकी जरूरत थी।

इन पैसों को आप अपने पास ही रखीए। आपकी नजरों में जो भी जरूरतमंद इन्सान आए आप भी उसकी पदद करिए। होटल के मालिक की यह बात सूनकर बेंजामिन बहूत प्रभावित हुए। बेंजामिन ने कहा मैं एसेही करूंगा, और उनका धन्यवाद करके वह चला गया। सिक्के भी अपने साथ ले आया। इसके बाद उन्होने एक एसेही जरूरतमंद व्यक्ती को वह सिक्के दिये। सिक्के देते हुए बेंजामिन बोला जब आप की आवष्यकता पुर्ण होने पर जब आप समर्थ होंगे तब आप भी किसी दुसरे व्यक्ती की मदद यह सिक्के देकर करें। दुसरे व्यक्ती ने कहा मै।भी जरूरतमंद व्यक्ती की मदद करूंगा। मैं समझुंगा की मेरे पैसे मुझे वापस मिल गये। क्योंकी इन पैसो से किसी दुसरे को मदद होगी, उसको भी बोलीए की आप भी किसी की मदद करो।

उस युवक की मदद करते हुये बोला किसी दुसरे इंसान की मदद करना ही इंसानीयत है। अगर हम किसी की मदद करते है तो वह पुण्य के रूप में हमारे पास 100 गुणा वापस आता है। और हमारे ऐसे पुण्य से हमको सफलता मिलती है। जैसे हम किसी को दुःख देते है तो हमारे पास उसके दुःख की लहरे हमारे पास सौ गुणा वापस आता है। दुःख देने वाला दुःख पाता है और सुःख देने वाला सुःख पाता है। इतना बोलकर बेंजामिन फ्रैंकलिन वहां से चला गया।

सर्वोत्तम संपत्ति में संतुष्टि - Satisfaction in best assets

एक बार किसी राज्य में बारिश न होने के कारण अकाल पड गया। जो खेत में बोया वह भी बरबाद हो गया। किसी के भी घर में खाने को नही था। सभी भुख और प्यास से बेहाल थे। उसी राज्य के जंमिदार ने घोषणा की बच्चों को वह रोज दो रोटी खाने को देगा सभी अपने बच्चों को संध्या के समय जमिंदार के यहां भेज दो। ऐसी नगर में जमिंदार ने घोषणा की। जमिंदार को कोई संतान नही थी। रोज सभी बच्चो को जमिंदार दो-दो रोटी अपने हाथों से बच्चों में बांटता था। पंरतू 10 साल की एक लडकी एक कोने में शांति से खडी रहती थी। दुसरे लडके उसको धक्का मारकर पिछे कर देते थे।और बडी-बडी रोटी लेकर जाते थे। इसिलिए वह चुपचाप एक और एकांत में खडी थी। अंत में लडकी की बारी आती तो एक छोटी रोटी लेती थी। वह उसी में खुश हो जाती थी। प्रतिदिन वह एक रोटी लेती और वह उसी एक रोटी में खुश होकर घर लेकर चली जाती थी।

और वह अपने घर जाकर अपने मां को देती थी। मां और बेटी दोनो साथ में रहते थे उनका और कोई नही था। दोनो मां बेटी रोटी भगवान का गुणगाण करते और शुक्रिया अदा करते आपने हमें भुखा नही सुलाया। एक ही रोटी में मां बेटी भगवान की महिमा करके शांति से सो जाते थे।

लडकी रोज की तरह रोटी का टुकडा लेकर घर आई। दोनो मां बेटी जब उसे खाने लगे तो उसे रोटी में सोने के 2/3 दाने मिले। लडकी की मां ने लडकी को बुलाकर कहा यह टुकडे जमिंदार को दे आओ। लडकी ने सोने के टुकडे लिए जमिंदार के पास गई और बोली कि आपने दी हुई रोटी में यह सोने के टुकडे मिले। जमिंदार आष्चर्य से देखता रह गया। सब कुछ सुनने के बाद जमिंदार बोला यह आप अपने पास रखो। जमिंदार को पता था यह लडकी रोटी लेने आती थी तो शांत खडी रहती थी और सबके रोटी लेने पर वह अंत में रोटी लेती थी। जमिंदार बोला कि तुम यह रख लो यह तुम्हारे सब्र का फल है। लडकी जमिंदार से बोली बाबुजी सब्र का फल तो रोटी के रूप में मुझे पहले ही सहज प्राप्त हुआ। मुझे भीड में धक्के नही खाने पडे। जमिंदार मन ही मन मुस्कुराया और बोला छोटी हो पर कितनी उंची बाते करती हो। जमिंदार के बहोत कहने पर भी उसने सोने के दाने रख दिये और वापस अपनी मां के पास चली गई। बाद में जमिंदार ने लडकी और उसकी मां को अपने घर में बुलाया और उस बच्ची को गोद लिया। अपनी संपत्ति का उसको उत्तराधिकारी बनाया। जमिंदार को कोई संतान नही थी। उसको उत्तराधिकारी जरूरत थी।

तात्पर्य :- विनाशी धन से सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है - संतुष्टता।

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                                                                                                                        Author By :- BK Geeta 
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